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काम के तनाव का आप पर बुरा प्रभाव

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अजय गुप्ता (परिवर्तित नाम), 29, पिछले एक साल से मानसिक स्वास्थ्य में बदलाव का सामना कर रहे हैं। ये ख़ास तौर से उन की नौकरी से जुड़े तनाव की वजह से है। अजय दिल्ली में एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी करते हैं और उन पर काम का बहुत दबाव है। अपने वरिष्ठ कर्मियों और बॉस के बारे में उन की प्रमुख शिक़ायत ये है कि उन लोगों का रवैया अपने कर्मियों के प्रति सकारात्मक नहीं है। अजय दिल्ली के एक निजी अस्पताल गए और अपनी समस्या के बारे में एक चिकित्सक से बात की।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अपने काम से जुड़ा तनाव झेलने वाले अजय अकेले व्यक्ति नहीं हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो अजय की तरह ही परेशानी का सामना कर रहे हैं।

चिकित्सकों का कहना है कि अनुमानित तौर पर कार्य-स्थल से जुड़ा तनाव भारत में सबसे बड़ी व्यावसायिक स्वास्थ्य समस्याओं में से एक माना गया है। भारत की नौकरीपेशा श्रेणी में लगभग 14 से 37 प्रतिशत मानसिक रोग पाया जाता है।

दिल्ली स्थित सर गंगा राम अस्पताल में मनोरोग चिकित्सा विभाग के उपाध्यक्ष डॉक्टर राजीव मेहता ने कहा कि कार्य से जुड़े तनाव में लंबी दूरी का सफ़र करना, कार्यस्थल पर शोषण, विश्वास की कमी और सहकर्मियों का दबाव भी शामिल है। तनाव की ही वजह से मानसिक रोग होते हैं जिन में चिंता और अवसाद भी शामिल हैं। निश्चित रूप से पिछले कुछ सालों से ये मामले बढ़ रहे हैं। अपनी ओपीडी में मैं कम से कम ऐसे पाँच रोगी देखता हूँ जो दफ़्तर जाते हैं और जिन्हें काम से जुड़ा तनाव है।

“स्पीक टू ऐनिवन ईज़ीली” पुस्तक के लेखक डॉ. मेहता ने बताया कि दवाओं और परामर्श के बाद अजय की हालत में सुधार हो रहा है। उन के अनुसार इस समस्या को जल्द पहचाने जाने और तुरंत इस के समाधान की ज़रूरत है। लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए कार्यस्थल पर ज़्यादा से ज़्यादा सकारात्मक तथा अनुकूल माहौल होना चाहिए।

एम्स में मनोरोग चिकित्सा के प्रोफ़ेसर डॉ. राजेश सागर  ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार युवाओं में काम से जुड़ा तनाव एक बड़ी समस्या है। काम से जुड़े तनाव की वजह से ना सिर्फ़ सेहत ख़राब होती है बल्कि इस की वजह से आर्थिक नुक़्सान भी होता है।

भारत में अपने कार्य जीवन के मुख्य वर्षों में लगभग 14 से 37 प्रतिशत लोग तनावग्रस्त होते हैं। मानसिक रोग या परेशानी कार्य स्थल पर अनुपस्थित होने का मुख्य कारण बनते हैं।  इसी वजह से उत्पादकता कम होती है और मुनाफ़ा घटता है। जिस की वजह से बॉस का व्यवहार ख़राब होता है, अधिक घंटों तक काम करना पड़ता है और कोई पदोन्नति भी नहीं होती।

उन्होंने आगे कहा कि जब हम रोगियों से बात करते हैं तो वे कार्य स्थल पर तनाव की एक वजह काम का दबाव बताते हैं। एम्स में हम सप्ताह में कम से कम दो दिन इस तरह के रोगियों को देखते हैं। कार्यस्थल पर कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को पहचानने के लिए जागरूकता और जानकारी फैलाने वाले कार्यक्रमों की ज़रूरत है।

ब्रिटिश उद्योग परिसंघ का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में 15 से तीस प्रतिशत कर्मी किसी न किसी मानसिक परेशानी से पीड़ित होंगे।

राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग चिकित्सा विभाग की प्रमुख डॉक्टर स्मिता देशपांडे  ने कहा कि इस में कोई शक़ नहीं कि युवाओं में काम से जुड़े तनाव के मामले बढ़ रहे हैं। ओपीडी में दस में से तीन रोगियों में मानसिक रोगों की वजह कार्यस्थल पर काम का ख़राब माहौल होता है।

डॉ. देशपांडे बताती हैं कि इन स्वास्थ्य समस्याओं में अवसाद और चिंता जैसी मानसिक और व्यवहार संबंधी परेशानियाँ शामिल हैं। अगर ये लंबे समय तक रहें तो बाद में नींद ना आना और स्वास्थ्य से जुड़ी कई अन्य समस्याएँ पैदा करती हैं। यहाँ तक कि इन की वजह से न्यूरो या तंत्रिका संबंधी विकार भी पैदा हो सकते हैं।

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